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रविवार, 11 सितंबर 2011

साहित्य में सीहोर की आवाज़ ........

हिंदी पत्रकारिता और साहित्य के बीच साठ-सत्तर के दशक तक भले ही सौहार्द्रपूर्ण रिश्ते रहे हों... एसपी सिंह के जमाने से पत्रकारिता में सक्रिय साहित्यकारों पर सवाल उठने शुरू हुए। पहली बार उन्हें पोंगापंथी पत्रकार तक कहा गया। भाषायी शुद्धतावादी और आग्रही होने के आरोप भी चस्पा हुए... धीरे-धीरे ये प्रवृत्ति हिंदी पत्रकारिता की बाद की पीढ़ियों में इतने गहरे तक धंस गई कि हिंदी साहित्य को कम से कम पत्रकारिता की दुनिया में बाहरी ग्रह का प्राणी माना जाने लगा, लेकिन पत्रकारिता के मन में एक बात छुपी रही...वह गंभीर और बौद्धिक होने का तमगा हासिल करने के चक्कर में इसी साहित्यकारिता और साहित्यिक लेखन के शरण में ही जाती रही। अंग्रेजी में कहते हैं न लव एंड हेट तो कुछ वही रिश्ता रहा...आज ये प्रवृत्ति खासतौर पर नजर आ रही है। साहित्यकारों को पत्रकारिता में उचित मुकाम तक पहुंचने ना दो, लेकिन गंभीरता और विमर्शवादी होने का प्रमाणपत्र उसी से हासिल करो, क्योंकि हिंदी का पाठक उसके ही प्रमाणपत्र को ज्यादा साखदार मानता है। इसी दौर में कुछ ऐसे भी पत्रकार रहे, जिन्होंने पत्रकारिता के धत्कर्माें से आजिज आकर पूरी तरह साहित्यकारिता को ही अपनी जिंदगी में बसा लिया। मध्यप्रदेश से दो नाम इन दिनों हिंदी साहित्य के आकाश में बेहद चर्चित हैं। पीली छतरी वाली लड़कियां, पाल गोमरा का स्कूटर, वारेन हेस्टिंगस का सांड, और अंत में प्रार्थना जैसी कहानियों के लेखक उदय प्रकाश को अब हिंदी का हर जागरूक पाठक जानता है। पाठकों की विशाल पूंजी में इन दिनों सफल सेंध मध्य प्रदेश के सीहोर निवासी पंकज सुबीर ने भी लगाई है।
उनके उपन्यास ‘ये वो सहर तो नहीं’ को हाल ही में दो-दो पुरस्कार मिले हैं। पहले इसी उपन्यास को ज्ञानपीठ ने अपने युवा सम्मान से नवाजा और अब जेसी जोशी स्मृति संस्थान ने शब्द साधना जनप्रिय युवा सम्मान से नवाजा है। जिंदगी की लड़ाई जवानी में ही बेहद मुश्किल दौर में होती है। हर हिंदी रचनाकार इसी दौर से निकलना और उसके बाद स्थायीत्व के साथ सुकून से रचाव की दुनिया में बसने की ख्वाहिश पाले होता है, लेकिन पहले टेलीविजन पत्रकार रहे सुबीर ने टेलीविजन पत्रकारिता की दुनिया को तभी अलविदा कह दिया, जब उनके सामने चुनौतियों के बावजूद संभावनाओं का खुला आकाश था। उन्होंने अपेक्षाकृत ज्यादा चुनौतीपूर्ण लेखन को पूरी तरह से अपना लिया। इसी दौरान उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी कई सशक्त कहानियां लिखीं और पाठकों के साथ ही समीक्षकों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया। पंकज ने इसी दौर में स्वतंत्रता आंदोलन में अपने शहर की लोकजीवन की उन घटनाओं पर अपना ध्यान केंद्रित किया, जो अक्सर इतिहास में जगह नहीं हासिल कर पातीं, जबकि इतिहास रचने और बदलने में उनका भी वैसा ही योगदान होता है। इसी मेहनत को उन्होंने औपन्यासिक रचना का कलेवर दिया और ये वो सहर तो नहीं जैसी कृति हिंदी साहित्य को मिल सकी। पंकज का स्वतंत्र रूप से अब तक सिर्फ एक ही कहानी संग्रह ईस्ट इंडिया कंपनी और एक ही उपन्यास ये वो सहर तो नहीं ही आया है। लेकिन तीन और संग्रहों में उनकी कहानियां प्रतिष्ठापूर्ण स्थान हासिल कर चुकी हैं। सीहोर का ये युवा रचनाकार अपने शहर की पहली किन्नर मेयर ममता की जिंदगी को आधार बना कर इन दिनों लेखन की तैयारियों में जुटा है। पंकज की खासियत उनकी भाषा है। उसमें रचाव तो नजर आता है...लेकिन बनावटीपन नजर नहीं आता। अपने कथाक्रम में वे कई बार चौंकाते भी हैं, लेकिन ये चौंकाना भी प्रकारांतर से नए प्रसंगों का परिचय ही कराता है। पाठक को इस तरह से जोड़ना और अपनी बात उसके अंतरतम तक पहुंचा पाने की उनकी ये शैली है और अपनी इसी शैली के कारण कथा जगत के उदीयमान हस्ताक्षरों में पहली पंक्ति में नजर आते हैं।
पंकज सुबीर 
- उमेश चतुर्वेदी

शनिवार, 10 सितंबर 2011

सीएम के जिले में कानून से बड़े पुलिस आरआई






   निर्दोष युवक कोसंगीन आरोपी की तरह पोलिसे वहन में ले जाती पोलिसे

         सीहोर। देश भक्ती और जनसेवा की  कसम खाने वाली पुलिस अब रक्षक नहीं भक्षक बन गई है। ऐसा ही एक मामला प्रकाश में आया जिसमें रक्षित निरीक्षकपुलिस पंकज परमार ने चालानी कार्यवाही के दौरान एक दो पहिया वाहन चाल·कको  वर्दी क रौब दिखाते हुए ना केवल उसका मोबाईल फेंका बल्क की उस निर्दोश युवक के बाल पक ·ड़क र उसे पुलिसिया वाहन में ऐसे पटक दिया मानों जैसे वह युवका संगीन आरोपी हो।
                                                    गौरतलब है की अक्सर कुभ कारणीय नींद में सोने वाला पुलिस अमला गाहे-बजाहे जागता है और महिने में एकबार जागकार मनचाही कार्यवाही को अंजाम देकार वापस गायब हो जाता है। शनिवार को भी कुछ ऐसा ही हुआ। यातायात पुलिस रक्षित निरीक्षक अकशल नेतृत्व में सैकड़ाखेड़ी जोड़ पर वाहन के कागज देखने की बजाय वर्दी का रोब झाडऩे में ज्यादा नजर आ रहा था। इधर अनन्त चतुर्दशी की तैयारियों और झांकीयों को अंतिम रुप देने में लगे युवक रात-रात भर मेहनतकर तैयारी में  लगे हैं इसी क्रम में बड़ा बाजार निवासी मोनू शर्मा भी गणेश उत्सव की झांकी के संबंध में आवश्यक कार्य निपटा कर सीहोर की तरफ आ रहा था के तभी रक्षित निरीक्ष· पंकज परमार ने उक्त युवक को रोकऔर उससे गाड़ी के कागजात दिखाने की बात कही। मोनू शर्मा ने तत्काल वाहन रोककर पुलिस से कहा की वाहनके कागज घर पर रखे हैं में लाकर दिखा दूंगा। लेकीन वहां मौजूद आरआई पंकज परमार ने उनकी एक न सुनी और पुलिसिया अंदाज में बिन सिर पैर की बात शुरू कर दी और युवक मोनू शर्मा के साथ बेमतलबकी बातें  ·रना शुरू ·र दिया। बात यही खत्म नहीं हुई आरआई पं·ज परमार ने अपना पुलिसिया रौब झाड़ते हुए उक्त युव· ·ा मोबाईल भी झड़प ·र सड़· पर फें· दिया। 
अब दिखाता हूं तुझे  समझकर पुलिस के नौसीखिये अधि·ारी पं·ज  परमार ने सीधे  युव· ·े बाल पकड़कर उसे जलीलकरते हुए एक तरफ फेंक दिया और कहा की अब  दिखाता हूं  तुझे वर्दी का रौब। इससे पहले ही युवक  कुछ समझ पाता तभी आरआई पंकज परमार ने उसकी कालर पकड़कर उसे फिर कहा की अब कोई  चालान नहीं वाहन जप्त होगा। जब युवक ने कहा की साहब ऐसा मत करो हमें बहुत काम है, झांकी बनाना है, आप चालान काट लो तब तक तो नौसीखिये पुलिस अधिकारी पंकज परमार ने ऐसा नाटक शुरु कीया की जैसे यहाँ कोई बड़ा आतंकी उन्होने पक·ड़ लिया है, सीधे युवक को उन्होने कालर प·कडी  घसीटते हुए अपने पुलिस वाहन में उठाकर लगभग फेंकते हुए बैठा दिया। पुलिस की यह असंवेदनशील हरकट  ने  युवककीआंखो में आंसू ला दिये। उसकेसाथ पुलिस का यह  तरीका कुछ  ऐसा था  जैसे वह कोई आदतन बड़ा  अपराधी हो और पुलिस  उसे वर्षों से ढूंढ रही हो। इसके बाद पुलिस युवीके  लाख कहने पर और चालान काटने की गुजारिश करने के बावजूद उसे कोतवाली ले गई। जहां एसडीओपी शर्मिंदा हो गयेलेकिन कुछ बोले नहीं। कोतवाली में जैसे ही पुलिस केयह नौसीखिये अधिकारी  युबक  लेकर  पहुँचे तो तब अनन्त चतुर्दशी की तैयारी कररहे युवको  ने कोतवाली  पुलिस को उक्त जान·ारी दे दी थी और एसडीओपी ·ो भी बताया था ·ि साहब आप·ी पुलिस ऐसा ·र रही है। जब निरपराध युव· मोनू शर्मा ·ो पुलिस वाहन में बैठा·र आदतन अपराधी ·ी तरह ·ोतवाली लाई तो यहां एसडीओपी ने मामला पूछा। उन्होंने नौसीखिये  अधि·ारी ·ी बात सुनी और युव· ·ी बात भी सुनी। एसडीओपी ने अंतत: युव· ·ो छोड़ देने ·ी बात ·ही। और पुलिस ने यहां चालान ·ाट·र युव· ·ो छोड़ दिया। जब·ि यह ·ाम मौ·े पर भी हो स·ता था।
एसपी ·े निर्देश हवा में
इस संबंध में एसपी ·ेडी पाराशर ·ो जान·ारी मोबाईल  फोन पर दे दी गई थी  आरआई पं·ज परमार ·े इस ·ार्य व्यवहार ·ीबात भी बताई गई थी ले·िन एसपी ·े निर्देश मोबाईल पर आने ·े बाद भी आरआई पं·ज परमार अपनी दबंगई पर अड़े रहे और उन्होंने एसपी ·े आदेशों ·ो भी मानना उचित नहीं समझा। अंतत: यह मामला ·ोतवाली त· पहुंचा गया। 
अपराधी ·ौन?
शनिवार ·ो जिस तरह से पुलिस ·े नौसीखिये अधि·ारी सड़· पर जनता ·े सामने खड़े हो·र हर·तें ·र रहे थे उससे स्पष्ट लग रहा था ·ि आखिर अपराधी जनता है या  पुलिस ।  आम जनता ·े साथ  अचान· प्र·ट हुई पुलिस ऐसे पेश आ रही थी मानो ·ोई शोले फिल्म ·े गब्बर सिंह ·ा राज चल रहा हो जहां बोलना भी गुनाह और ना बोलना भी अपराध। आम जनता ·े साथ मारपीट, बाल प·ड़·र जलील ·रना ऐसा लग रहा था  ·ि सीहोर में भी वर्दीवाले गुंडे आ गये हो।
अनन्त चतुर्दशी से दूर रखें
उक्त घटना ·े बाद से ही नगर ·ी गणेश उत्सव व झां·ी उत्सव समितियों में खासा रोष था। समितियों ·े प्रमुखों ने पुलिस ·े आला अधि·ारियों से यह  अपील  ·ी है ·ि ऐसे अडिय़ल पुलिस अधि·ारियों ·ो चतुर्दर्शी चल समारोह व्यवस्था से अलग ही रखा जाए वरना इन·ी हर·तों से शहर में माहौल  बिगड़ स·ता है और आमजनों ·ा  पुलिस से भरोसा उठ जाएगा।

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

शिक्षीका क गले से चैन छिनने का प्रयास

 
-पल्सर मोटर साइकिल पर थे आरोपी 
          सीहोर!गुरुवार को नमक चौराहा पर रेह्न्र वाली शिक्षीका संध्या मिश्रा रोजाना की तरह घर से महारानी कन्या स्कूल जा रही की तभी उनके पीछे आ रहे पल्सर मोटरसाइकिल पर सवार दो अज्ञात आरोपियों ने unke                 गले  में से चैन झपटने का प्रयास किया हलाकि यह आरोपी चैन ले जाने में  कामयाब नहीं हो पाए !इधर जैसे ही पोलिसे को इस बारदात का पता चला वैसे ही पोलिसे ने लाल  रंग की  मोटरसाइकिल की तलाश शुरू कर दी लेकिन आरोपी अभी भी पोलिसे की गिरफ्त से दूर है !