सीहोर। दीपावली पर्व पर लाखों दीपक का निर्माण कर लोगों के घरों में रोशनी फैलान वाले कुंभकार समाज के लोग खुद अंधेरे में जीवन यापन करने को विवश हैं। मिटटी को रोंदकर खूबसूरत आकार देने वाला कुंभकार समाज सदियों से मिटटी से ही रोजी रोटी कमा रहा है। युवा पीढ़ी ने पारंपरिक व्यवसाय को अलविदा कर अन्य काम धंधों को अपनाना शुरू कर दिया है। इसके बावजूद मिटटी को आकार देने वाले समाज के उम्रदराज लोग आज भी अपने पुस्तैनी धंधे में लगे हुए हैैं। उनके इस एक मात्र धनोपार्जन जरिए को मोमबत्ती उद्योग और बिजली चलित झिलमिलाती झालरों ने खासा नुकसान पहुंचाया हैं। आधुनिक समय तथा शिक्षा के तेजी से बढ़ते प्रसार के उपरांत भी कुंभकार समाज के युवा शिक्षा के क्षेत्र में काफी पिछड़े हुए हैं। सरकार द्वारा समाज के उत्थान के लिए कोई कारगार योजना नहीं बनाने से और इसके विपरीत मिटटी खनन पर प्रतिबंध लगाने से समाज लगातार पीछे की और जा रहा है फिर भी गंज क्षेत्र स्थित कुम्हार मोहल्ले में रहने वाले उम्रदराज लोग दीपावली पर्व पर उत्साह से यहां दीपकों का निर्माण करते हैं। वहीं अपने करामाती हाथों से माता लक्ष्मी की प्रतिमा सहित आकर्षक खिलौने भी गड़ रहे हैैं और इस भारतीय संस्कृति को सहेजे हुए हैं।
क्या कहते हैैं कुम्हार
मिटटी के उत्पादों पर किसी की काली नजर लग गई है। जहां हम पहले दीपावली के सीजन में दस हजार के करीबन दिए बेच लेते थे वहीं अब यह संख्या पांच हजार पर ठहर गई है। इसके बाद भी लागत मूल्य भी निकालना मुश्किल हो रहा है। मिटटी पर भी सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है और पचास रूपए भरास के भाव लेनी पड़ रही है और जलाऊ लकड़ी भी काफी महंगी हो गई है। सरकार द्वारा हमारे लिए कोई विशेष योजना नहीं चलाई जा रही है, जिस वजह से इस पुस्तैनी कार्य को नवयुवक छोड़ रहे हैैं।
मिश्रीलाल प्रजापति, दीपक निर्माता
पिछले बीस सालों से दीपावली पर्व पर दीपक बना रहे हैैं। उनका कहना हैै कि जहां पहले एक लाख दीपकों का निर्माणकर बाहर भी भेजा जाता था वहीं अब शहर में दस हजार दीपक बेचना भी मुश्किल हो रहा है। मोमबत्ती उद्योग ने हमारे पारंपरिक मिटटी से निर्मित दीपकों को काफी नुकसान पहुंचाया है जिस वजह से आजीविका चलाना भी इस व्यवसाय से मुश्किल हो रहा है। हम दूसरे के घरों में रोशनी तो फैैला रहें है, लेकिन हम खुद रोशनी से महरूम हैं। एक दीपक निर्माण पर वर्तमान में बढ़ती महंगाई के कारण पचास पैसे का खर्च आ रहा है इसके बाद भी दीपकों को श्रद्घा के साथ भाव के भाव बेचा जा रहा है।
गंगाराम प्रजापति , दीपक निर्माता
आंखों में रोशनी नहीं है इसके बावजूद वह मिटटी को अपने हाथों से तराशकर आकर्षक रूप दे रहे हैैं उनका कहना है कि सरकार द्वारा किसी प्रकार की कोई मदद हमारे समाज के उत्थान के लिए नहीं दी जा रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा सभी समाजों की पंचायतें बुलाई हैं लेकिन कुंभकार समाज को वह भूल गए हैं तो इधर बढ़ती महंगाई और प्लास्टिक के खिलौनो ने मिटटी के खिलौनों का वजूद की खत्म सा कर दिया है।
राधेश्याम प्रजापति, दीपक निर्माता
दीपक के कारोबार से केवल लागत ही निकल पाती है थोड़ा कुछ मिल जाए तो गनीमत है धीरे-धीरे हम लोग अब इस पारम्परिक कार्य से दूर होते जा रहे हैं क्योंकि लोग दीपक लेने की बजाए दीपावली के समय दूसरे आधुनिक संसाधन का उपयोग प्रकाश के लिए करने लगे है। वहीं सरकार की और से इस समाज की और ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
रामप्रसाद प्रजापति
क्या कहते हैैं कुम्हार
मिटटी के उत्पादों पर किसी की काली नजर लग गई है। जहां हम पहले दीपावली के सीजन में दस हजार के करीबन दिए बेच लेते थे वहीं अब यह संख्या पांच हजार पर ठहर गई है। इसके बाद भी लागत मूल्य भी निकालना मुश्किल हो रहा है। मिटटी पर भी सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है और पचास रूपए भरास के भाव लेनी पड़ रही है और जलाऊ लकड़ी भी काफी महंगी हो गई है। सरकार द्वारा हमारे लिए कोई विशेष योजना नहीं चलाई जा रही है, जिस वजह से इस पुस्तैनी कार्य को नवयुवक छोड़ रहे हैैं।
मिश्रीलाल प्रजापति, दीपक निर्माता
पिछले बीस सालों से दीपावली पर्व पर दीपक बना रहे हैैं। उनका कहना हैै कि जहां पहले एक लाख दीपकों का निर्माणकर बाहर भी भेजा जाता था वहीं अब शहर में दस हजार दीपक बेचना भी मुश्किल हो रहा है। मोमबत्ती उद्योग ने हमारे पारंपरिक मिटटी से निर्मित दीपकों को काफी नुकसान पहुंचाया है जिस वजह से आजीविका चलाना भी इस व्यवसाय से मुश्किल हो रहा है। हम दूसरे के घरों में रोशनी तो फैैला रहें है, लेकिन हम खुद रोशनी से महरूम हैं। एक दीपक निर्माण पर वर्तमान में बढ़ती महंगाई के कारण पचास पैसे का खर्च आ रहा है इसके बाद भी दीपकों को श्रद्घा के साथ भाव के भाव बेचा जा रहा है।
गंगाराम प्रजापति , दीपक निर्माता
आंखों में रोशनी नहीं है इसके बावजूद वह मिटटी को अपने हाथों से तराशकर आकर्षक रूप दे रहे हैैं उनका कहना है कि सरकार द्वारा किसी प्रकार की कोई मदद हमारे समाज के उत्थान के लिए नहीं दी जा रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा सभी समाजों की पंचायतें बुलाई हैं लेकिन कुंभकार समाज को वह भूल गए हैं तो इधर बढ़ती महंगाई और प्लास्टिक के खिलौनो ने मिटटी के खिलौनों का वजूद की खत्म सा कर दिया है।
राधेश्याम प्रजापति, दीपक निर्माता
दीपक के कारोबार से केवल लागत ही निकल पाती है थोड़ा कुछ मिल जाए तो गनीमत है धीरे-धीरे हम लोग अब इस पारम्परिक कार्य से दूर होते जा रहे हैं क्योंकि लोग दीपक लेने की बजाए दीपावली के समय दूसरे आधुनिक संसाधन का उपयोग प्रकाश के लिए करने लगे है। वहीं सरकार की और से इस समाज की और ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
रामप्रसाद प्रजापति

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